खाली खेत उगलेंगे ‘काला सोना’: गेहूं की कटाई के बाद बस 75 दिन की मेहनत, और लबालब भर जाएगी तिजोरी
गेहूं कटाई के बाद खेत खाली छोड़ने के बजाय उड़द की इन 5 उन्नत किस्मों की बुवाई करें। जिला कृषि अधिकारी के अनुसार, मात्र 75-80 दिनों में ये फसलें 12 क्विंटल तक पैदावार और मिट्टी को नई ताकत देती हैं। जानिए पूरी रिपोर्ट।
- गेहूं की कटाई के बाद खाली खेतों का मास्टर प्लान
- 75 से 80 दिनों में पकने वाली उड़द की टॉप-5 किस्में
- प्रति हेक्टेयर 12 क्विंटल तक बंपर पैदावार का अनुमान
- मिट्टी की ऊर्वरा शक्ति बढ़ाने वाला ‘प्राकृतिक खाद’ फॉर्मूला
बाराबंकी/लखनऊ: भारतीय खेती में अक्सर एक कहावत कही जाती है कि “खेत खाली तो किसान खाली”, लेकिन बदलते दौर में अब खेत को खाली छोड़ना घाटे का सौदा साबित हो रहा है। आमतौर पर गेहूं की कटाई के बाद किसान मानसूनी बारिश का इंतजार करते हैं और खेत महीनों तक पड़े रहते हैं। लेकिन कृषि वैज्ञानिकों और जिला कृषि अधिकारी विजय कुमार ने एक ऐसा ‘मनी-मेकिंग’ फॉर्मूला दिया है, जो आपके सूखे पड़े खेतों को महज 2.5 महीने में नोट छापने की मशीन बना सकता है।
यह जादू है उड़द की उन्नत खेती का। उत्तर प्रदेश के बाराबंकी से लेकर देश के मैदानी इलाकों तक, उड़द की मांग कभी कम नहीं होती। दलहन की यह फसल न केवल आपकी जेब गरम करती है, बल्कि अगली फसल के लिए जमीन में नाइट्रोजन का खजाना भी भर देती है।
क्यों है यह ‘गोल्डन चांस’?
जब बाजार में दालों की कीमतें आसमान छू रही हों, तब अपनी जमीन का इस्तेमाल अतिरिक्त कमाई के लिए करना समझदारी है। विजय कुमार बताते हैं कि उड़द की कुछ ऐसी किस्में हैं जो मानसून आने से पहले ही खलिहान में पहुंच जाती हैं। यानी कम रिस्क, कम पानी और जबरदस्त मुनाफा।
कम वक्त में ज्यादा वजन: इन 5 किस्मों ने मचाया तहलका
खेती की दुनिया में सही बीज का चुनाव आधी जंग जीतने जैसा है। अगर आप भी इस सीजन में बाजी मारना चाहते हैं, तो इन किस्मों पर नजर डालिए:
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T-9 (सदाबहार पसंद): यह किसानों की पहली पसंद है। इसके काले और चमकदार दाने बाजार में देखते ही बिक जाते हैं। महज 75-80 दिनों में यह 9 से 10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की पैदावार दे देती है।
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आजाद 2 (यूपी की शान): उत्तर प्रदेश की मिट्टी के लिए इसे सबसे मुफीद माना गया है। 80 दिनों के भीतर यह फसल 11 क्विंटल तक का उत्पादन देने की क्षमता रखती है।
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PU-31 (राजस्थान और शुष्क इलाकों के लिए): अगर पानी की थोड़ी कमी है, तो यह किस्म बेस्ट है। यह 70 से 80 दिनों में पककर तैयार हो जाती है और पैदावार 12 क्विंटल तक जा सकती है।
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IPU 94-1: जो किसान थोड़ा धैर्य रख सकते हैं, उनके लिए यह 85 दिन की फसल है। लेकिन इसका झाड़ (Yield) अन्य किस्मों के मुकाबले ज्यादा ठोस होता है।
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PDU-1 (वैज्ञानिकों का तोहफा): कानपुर के दलहन अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित यह किस्म अपनी मजबूती के लिए जानी जाती है। 11 क्विंटल की पैदावार के साथ यह छोटे किसानों के लिए वरदान है।
सिर्फ पैसा नहीं, मिट्टी को भी मिलता है ‘बूस्टर’
उड़द की खेती का सबसे बड़ा छुपा हुआ फायदा इसकी जड़ों में है। यह दलहन फसल होने के नाते हवा से नाइट्रोजन सोखकर जमीन में फिक्स करती है। इसका मतलब है कि उड़द काटने के बाद जब आप अगली मुख्य फसल बोएंगे, तो आपको खाद पर कम खर्च करना पड़ेगा।
यही वजह है कि कृषि विभाग अब किसानों को जागरूक कर रहा है कि वे गेहूं के बाद खेत को ‘रेस्ट’ देने के बजाय ‘स्मार्ट फार्मिंग’ की ओर बढ़ें। महज 75 दिन का यह निवेश आपकी साल भर की आर्थिक स्थिति बदल सकता है।



