2025 में किसानों के लिए बड़ा सवाल: क्या खेतों में यूरिया का उपयोग अब भी सही है?

2025 में भारत में यूरिया (Urea) का उपयोग खेती में बड़ा सवाल बन चुका है। जानिए कैसे यह मिट्टी, पर्यावरण और स्वास्थ्य पर असर डाल रहा है और कौन से विकल्प किसानों को अपनाने चाहिए।

Urea use in 2025 (India health and environment): भारतीय खेती-किसानी में यूरिया (Urea) सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला उर्वरक है। लंबे समय से यह नाइट्रोजन का सस्ता और असरदार स्रोत माना जाता रहा है। लेकिन 2025 तक आते-आते मिट्टी की उर्वरता, प्रदूषण और किसानों व आम जनता के स्वास्थ्य पर इसके गंभीर दुष्प्रभावों को लेकर बहस तेज हो गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यूरिया अब खेती के लिए दो धारी तलवार साबित हो रहा है। सवाल उठता है कि क्या किसानों को अभी भी यूरिया पर निर्भर रहना चाहिए या फिर वैकल्पिक विकल्प अपनाने का समय आ गया है?

यूरिया का बढ़ता इस्तेमाल और खतरे

भारत में प्रति वर्ष करीब 30 मिलियन टन यूरिया की खपत का अनुमान है जो दुनिया में सबसे ज्यादा है। हालांकि लगातार अधिक उपयोग मिट्टी, पानी और हवा को नुकसान पहुंचा रहा है।

मिट्टी की उर्वरता पर असर: विशेषज्ञों के मुताबिक यूरिया केवल नाइट्रोजन देता है जबकि पौधों को संतुलित विकास के लिए फॉस्फोरस और पोटाश जैसे पोषक तत्व भी चाहिए। लगातार यूरिया डालने से मिट्टी की जैविक गुणवत्ता घट रही है जिससे पैदावार का स्तर धीरे-धीरे नीचे जा सकता है।

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जलवायु और पर्यावरण पर दुष्प्रभाव: यूरिया का बड़ा हिस्सा मिट्टी में समा नहीं पाता और बारिश के साथ बहकर नदियों, तालाबों और भूजल तक पहुंच जाता है। इससे नाइट्रेट का स्तर खतरनाक तरीके से बढ़ रहा है। इसके अलावा यूरिया से निकलने वाली अमोनिया गैस वायु प्रदूषण को और गंभीर बना रही है खासतौर पर दिल्ली-एनसीआर जैसे इलाकों में।

कृषि पैदावार और गुणवत्ता पर असर: नाइट्रोजन की अधिकता होने से पौधों की वृद्धि असंतुलित हो जाती है। परिणामस्वरूप सब्जियों और फलों का स्वाद, पोषण और स्टोर करने की क्षमता प्रभावित होती है।

मानव स्वास्थ्य पर खतरे

दूषित पानी और भोजन से नाइट्रेट पॉइजनिंग (Nitrate Poisoning) हो सकती है जो बच्चों के लिए बेहद खतरनाक है। यूरिया से दूषित पानी, भोजन अगर लंबे समय तक सेवन किया जाता है तो इससे कैंसर का जोखिम बढ़ जाता है। इससे निकलने वाली अमोनिया गैस से अस्थमा और सांस की बीमारियां तेज हो सकती हैं। सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी के कारण लोगों में पोषण की कमी बढ़ जाती है। कुल मिलाकर सेहत के लिए ये किसी भी प्रकार से फिट नहीं बैठता है ओर दुनिया के कई देशों ने यूरिया का इस्तेमाल करना बंद करके जैविक खेती पर जोर दिया जा रहा है।

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क्या हैं बेहतर विकल्प?

यूरिया का अन्य रासायनिक खादों के विकल्प हमे तलाश करने की जरूरत ही नहीं है क्योंकि पहले से ही इसके विकल्प मौजूद है। इंसान शुरुआत से ही यूरिया या फिर अन्य रासायनिक खादों का इस्तेमाल नहीं करता था। जानिए कौन कौन से विकल्प अब 2025 में हमारे पास मौजूद है:

Organic Farming: गोबर खाद, वर्मी कम्पोस्ट और हरी खाद का बढ़ता महत्व।Nano Urea: कम मात्रा में ज्यादा असरदार विकल्प।Balanced Fertilizer Use: NPK का वैज्ञानिक अनुपात अपनाना।

Climate-Smart Farming: ड्रिप इरिगेशन और Precision Farming तकनीकों का इस्तेमाल।

Government Initiatives: नीम-कोटेड यूरिया और Soil Health Card योजना से संतुलित खेती को बढ़ावा।

किसानों को लालच छोड़ना होगा

2025 में यूरिया किसानों के लिए तुरंत राहत देने वाला उर्वरक है लेकिन इसके दीर्घकालिक नुकसान गंभीर हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि किसानों को अब संतुलित व टिकाऊ खेती की दिशा में सोचना होगा। सरकार, वैज्ञानिक और किसान अगर मिलकर विकल्पों पर जोर दें तो भारतीय कृषि को आने वाले समय में अधिक स्वस्थ और सुरक्षित बनाया जा सकता है।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि किसानों ने उपज बढ़ाने के लिए रासायनिक खादों का इस्तेमाल शुरू किया था ताकि अधिक पैदावार से अधिक मुनाफा कमाया जा सके लेकिन लंबे समय तक खेतों में इसके इस्तेमाल से बहुत गंभीर परिणाम सामने आते है। इसलिए किसानों को अब जैविक खेती की ओर बढ़ना चाहिए। विनोद यादव की रिपोर्ट: फॉर एनएफएल स्पाइस न्यूज.

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Saloni Yadav

सलोनी यादव (Journalist): एक अनुभवी पत्रकार हैं जिन्होंने अपने 10 साल के करियर में कई अलग-अलग विषयों को बखूबी कवर किया है। उन्होंने कई बड़े प्रकाशनों के साथ काम किया है और अब NFL स्पाइस पर अपनी सेवाएँ दे रही हैं। सलोनी यादव हमेशा प्रामाणिक स्रोतों और अपने अनुभव के आधार पर जानकारी साझा करती हैं और पाठकों को सही और विश्वसनीय सलाह देती हैं। Contact Email: saloniyadav@nflspice.com Website: nflspice.com
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