30 सितंबर तक कराएं टैक्स ऑडिट, वरना लगेगा भारी जुर्माना!

“सेक्शन 44ADA उन प्रोफेशनल्स के लिए है, जो प्रिजम्प्टिव टैक्सेशन चुनते हैं. इसमें आपकी कुल कमाई का 50% टैक्सेबल आय माना जाता है बशर्ते आपकी सालाना आय 50 लाख रुपये से कम हो. अगर कैश लेनदेन 5% से कम है तो यह सीमा 75 लाख रुपये तक हो सकती है.”

टैक्स ऑडिट का नाम सुनते ही कई लोग सोचते हैं कि ये सिर्फ बड़ी कंपनियों के लिए है. लेकिन ऐसा नहीं है. अगर आप फ्रीलांसर, डॉक्टर, वकील या कोई छोटा-मोटा बिजनेस चलाते हैं तो आपको भी टैक्स ऑडिट करवाने की जरूरत हो सकती है. इनकम टैक्स विभाग ने इसके लिए 30 सितंबर तक की डेडलाइन दी है. आइए आसान भाषा में समझते हैं कि टैक्स ऑडिट क्या है इसे किन्हें करवाना जरूरी है और नियम न मानने की सजा क्या हो सकती है.

टैक्स ऑडिट क्या होता है?

टैक्स ऑडिट आपके फाइनेंशियल रिकॉर्ड्स की जांच का एक तरीका है. इसे चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) द्वारा किया जाता है, जो यह सुनिश्चित करता है कि आपका बिजनेस या प्रोफेशनल इनकम टैक्स नियमों का पालन कर रहा है. यह एक तरह से आपके अकाउंट्स का “हेल्थ चेकअप” है जो सरकार को पारदर्शिता देता है और आपको अपने वित्तीय रिकॉर्ड्स को दुरुस्त रखने में मदद करता है.

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किन्हें करवाना पड़ता है टैक्स ऑडिट?

टैक्स ऑडिट की जरूरत न सिर्फ बड़े बिजनेस बल्कि छोटे कारोबारियों और प्रोफेशनल्स को भी हो सकती है. ये हैं कुछ खास नियम:

  • बिजनेस वालों के लिए: अगर आपका सालाना टर्नओवर 1 करोड़ रुपये से ज्यादा है तो टैक्स ऑडिट जरूरी है. लेकिन अगर आपके 95% से ज्यादा लेनदेन डिजिटल (जैसे UPI, कार्ड या ऑनलाइन ट्रांसफर) हैं तो यह सीमा 10 करोड़ रुपये तक बढ़ जाती है.

  • प्रोफेशनल्स के लिए: अगर आप डॉक्टर, वकील, आर्किटेक्ट, फ्रीलांसर या चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं और आपकी सालाना आय 50 लाख रुपये से ज्यादा है तो आपको टैक्स ऑडिट करवाना होगा.

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  • प्रिजम्प्टिव टैक्सेशन स्कीम (सेक्शन 44ADA): अगर आपने इस स्कीम को चुना है और अपनी आय को निर्धारित 50% से कम दिखाया है तो भी ऑडिट जरूरी है. इस स्कीम में डॉक्टर, वकील, इंजीनियर, फिल्म प्रोफेशनल्स जैसे लोग शामिल हैं. अगर आपके कैश लेनदेन 5% से कम हैं तो आय की सीमा 75 लाख रुपये तक बढ़ सकती है.

सेक्शन 44ADA का नियम क्या कहता है?

दिल्ली के चार्टर्ड अकाउंटेंट राधेश्याम तिवारी बताते हैं “सेक्शन 44ADA उन प्रोफेशनल्स के लिए है, जो प्रिजम्प्टिव टैक्सेशन चुनते हैं. इसमें आपकी कुल कमाई का 50% टैक्सेबल आय माना जाता है बशर्ते आपकी सालाना आय 50 लाख रुपये से कम हो. अगर कैश लेनदेन 5% से कम है तो यह सीमा 75 लाख रुपये तक हो सकती है.” अगर आप दावा करते हैं कि आपकी आय 50% से कम है तो आपको अपने खातों का हिसाब-किताब रखना होगा और ऑडिट करवाना पड़ेगा.

डेडलाइन और जुर्माने का डर

टैक्स ऑडिट की आखिरी तारीख है 30 सितंबर. अगर आप इस तारीख तक ऑडिट पूरा नहीं करते तो टर्नओवर का 0.5% या 1.5 लाख रुपये (जो कम हो) तक का जुर्माना लग सकता है. हालांकि अगर देरी का कोई वाजिब कारण हो जैसे बीमारी या तकनीकी दिक्कत तो टैक्स विभाग इसे माफ भी कर सकता है.

लोग कहां करते हैं गलती?

कई लोग टैक्स ऑडिट को लेकर गलतफहमी में रहते हैं:

  • कुछ लोग सोचते हैं कि टैक्स ऑडिट सिर्फ बड़ी कंपनियों के लिए है लेकिन छोटे बिजनेस और प्रोफेशनल्स को भी इसकी जरूरत हो सकती है.

  • कई बार लोग डिजिटल लेनदेन की सीमा (10 करोड़ रुपये) को गलत समझ लेते हैं और ऑडिट से बचने की कोशिश करते हैं.

  • कुछ प्रोफेशनल्स यह भूल जाते हैं कि अगर वे प्रिजम्प्टिव स्कीम में कम आय दिखाते हैं तो ऑडिट अनिवार्य हो जाता है.

टैक्स ऑडिट क्यों है जरूरी?

टैक्स ऑडिट सिर्फ नियमों का पालन करने के लिए ही नहीं बल्कि आपके बिजनेस या प्रोफेशन की वित्तीय सेहत को बनाए रखने के लिए भी जरूरी है. यह आपके रिकॉर्ड्स को व्यवस्थित करता है टैक्स गलतियों को पकड़ता है और भविष्य में बड़ी परेशानियों से बचाता है. साथ ही यह सरकार के साथ आपकी पारदर्शिता को भी बढ़ाता है.

क्या करें?

अगर आपकी आय या टर्नओवर टैक्स ऑडिट की सीमा में आता है तो जल्दी से किसी चार्टर्ड अकाउंटेंट से संपर्क करें. अपने फाइनेंशियल रिकॉर्ड्स को तैयार रखें और 30 सितंबर से पहले ऑडिट पूरा कर लें. देरी से बचें ताकि जुर्माने का झंझट न झेलना पड़े.

टैक्स नियमों को समझना और उनका पालन करना आपके बिजनेस और प्रोफेशन को सुचारू रूप से चलाने का एक अहम हिस्सा है. तो समय रहते कदम उठाएं और टैक्स ऑडिट को आसान बनाएं!

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Rajveer singh

राजवीर सिंह एक पेशेवर कंटेंट राइटर हैं, जिन्हें पत्रकारिता का अनुभव है और स्थानीय, सामुदायिक और अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं की गहरी समझ रखते हैं। वे अपने ज्ञान का उपयोग न केवल अपनी शैक्षणिक पृष्ठभूमि, बल्कि अपनी प्रत्यक्ष समझ के आधार पर जानकारीपूर्ण लेख लिखने में करते हैं। वे केवल सूचना देने के लिए नहीं, बल्कि आवाज़ उठाने के लिए भी लिखते हैं।
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