रूपये में ऐतिहासिक गिरावट: डॉलर के मुकाबले रुपया पहुंचा रिकॉर्ड निचले स्तर पर, जानिए क्या हैं उसके पीछे की सच्चाई
भारतीय रुपया मंगलवार को डॉलर के मुकाबले पहली बार 88.80 के स्तर से नीचे गिर गया, जो अब तक का सबसे न्यूनतम स्तर है। इस गिरावट ने पिछले सप्ताह के रिकॉर्ड 88.7975 को भी पार कर लिया है। विदेशी मुद्रा बाजार में इस गिरावट का मुख्य कारण भारत-अमेरिका के बीच व्यापारिक मुद्दों का बढ़ता तनाव और अमेरिकी डॉलर की मजबूती है।
मंगलवार को भारतीय रुपये ने अमेरिकी डॉलर के मुकाबले नया रिकॉर्ड बनाया और 88.80 के निचले स्तर पर पहुंच गया। यह अब तक का सबसे कमजोर इंट्राडे स्तर है। विदेशी मुद्रा बाजार (Forex Market) में इस गिरावट ने हर किसी का ध्यान खींचा है। आइए जानते हैं कि रुपये की इस कमजोरी (Rupee Depreciation) के पीछे क्या कारण हैं और इसका आम आदमी की जिंदगी पर क्या असर पड़ेगा।
रुपये की गिरावट के पीछे की वजहें
रुपये की इस गिरावट के पीछे कई आर्थिक और वैश्विक कारण हैं। भारत और अमेरिका के बीच बढ़ते व्यापारिक तनाव (Trade Tensions) और अमेरिकी ब्याज दरों में बढ़ोतरी (US Interest Rates Hike) ने विदेशी निवेशकों को भारतीय बाजार से पैसा निकालने के लिए मजबूर किया है। इसके अलावा, अमेरिका द्वारा आयात शुल्क (Import Tariffs) और वीजा फीस बढ़ाने से भारतीय IT और निर्यात क्षेत्र (Export Sector) पर दबाव बढ़ा है। इससे रुपये की मांग कम हुई है, जिससे इसकी कीमत में और गिरावट आई।
महंगाई का बढ़ेगा बोझ
रुपये की कमजोरी का सबसे बड़ा असर महंगाई (Inflation) पर पड़ता है। आयातित सामान जैसे पेट्रोल, डीजल, इलेक्ट्रॉनिक्स और खाद्य तेल (Edible Oils) की कीमतें बढ़ रही हैं। पेट्रोल-डीजल महंगा होने से ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट (Transportation Cost) बढ़ता है, जिसका असर बाजार में बिकने वाली हर चीज पर पड़ता है। इससे आम आदमी की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है।
यात्रा और माल ढुलाई में इजाफा
भारत अपनी ईंधन जरूरतों (Fuel Imports) के लिए आयात पर निर्भर है। रुपये की गिरावट से ईंधन की कीमतें बढ़ेंगी, जिसका सीधा असर बस, टैक्सी और माल ढुलाई (Freight Charges) पर पड़ेगा। इससे न केवल यात्रा महंगी होगी, बल्कि सामान की ढुलाई का खर्च भी बढ़ेगा, जो व्यापार और रोजमर्रा की खपत (Consumption) को प्रभावित करेगा।
विदेशी कर्ज और लोन होंगे महंगे
रुपये की कमजोरी से सरकार और कंपनियों को विदेशी कर्ज (Foreign Debt) चुकाने के लिए ज्यादा रुपये खर्च करने पड़ेंगे। इससे ब्याज दरें (Interest Rates) बढ़ सकती हैं, जिसका असर होम लोन, कार लोन और अन्य EMI (Loan EMIs) पर पड़ेगा। साथ ही, स्मार्टफोन, दवाइयां और अन्य आयातित सामान (Imported Goods) की कीमतें भी बढ़ेंगी।
मजदूरी और खाद्य महंगाई पर असर
रुपये की गिरावट से खाद्य मुद्रास्फीति (Food Inflation) और मजदूरी पर भी असर पड़ रहा है। आयातित कच्चा माल और ईंधन की बढ़ती लागत से खाद्य पदार्थों (Food Prices) की कीमतें बढ़ रही हैं। खासकर उन चीजों पर जो आयातित सामग्री या ईंधन पर निर्भर हैं। इससे न केवल खाने-पीने की चीजें महंगी होंगी, बल्कि मजदूरों की क्रय शक्ति (Purchasing Power) भी कम होगी।
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विशेषज्ञों का मानना है कि अगर वैश्विक आर्थिक स्थिति (Global Economy) में सुधार नहीं होता, तो रुपये पर दबाव बना रह सकता है। हालांकि, सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) इस स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कदम उठा सकते हैं। आम आदमी को इस दौरान अपने खर्चों पर नजर रखनी होगी और महंगाई से निपटने के लिए बजट प्लानिंग (Budget Planning) करनी होगी।
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