2026 में किसकी चमक ज्यादा? चांदी तेज़ दौड़ रही, मगर सोना अब भी सबसे बड़ा सहारा – निवेशक क्या करें?

2026 की शुरुआत में चांदी ने तेज़ रफ्तार पकड़ ली, जबकि सोना अपेक्षाकृत शांत रहा। इंडस्ट्रियल डिमांड और सप्लाई घाटा चांदी को चर्चा में ला रहे हैं लेकिन लंबी अवधि में सोना अब भी भरोसेमंद सुरक्षा कवच बना हुआ है।

  • 2026 की शुरुआत में चांदी ऊंचे स्तर पर, सोना सीमित दायरे में
  • इंडस्ट्रियल डिमांड और सप्लाई घाटे से चांदी को मजबूती
  • सोना अब भी निवेशकों के लिए भरोसेमंद सेफ-हेवन
  • 2026 में संतुलित निवेश के लिए गोल्ड-सिल्वर पर फोकस

Gold Silver in 2026: साल के पहले सप्ताह के एक दिन में ही बाज़ार में यह बहस तेज हो गई है कि 2026 की चमक किस धातु के नाम होगी – चांदी या सोना। कई इंटरनेशनल रिपोर्ट्स पहले ही चेतावनी दे चुकी हैं कि चांदी बाज़ार में सप्लाई की कमी और इंडस्ट्रियल डिमांड (industrial demand) मिलकर एक नया दौर शुरू कर सकते हैं जबकि सोना अभी भी सुरक्षा कवच (safe haven) के तौर पर मजबूती से बना हुआ है।

2026 की शुरुआत में सोना शांत है ओर चांदी आक्रामक

नए साल के पहले कारोबारी सत्र में ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म और ज्वेलर्स के रेट शीट दोनों जगह एक दिलचस्प तस्वीर दिखी – सोने की चाल सीमित रही लेकिन चांदी ने तेज़ मूवमेंट के साथ साल की ओपनिंग की।

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देश के प्रमुख शहरों में जहां 24 कैरेट सोना 10 ग्राम पर लगभग 1.35 लाख रुपये के आसपास टिका दिखा तो वहीं चांदी का भाव 1 किलो पर 2.35–2.38 लाख रुपये की रेंज में घूमता दिखा जो पिछले महीनों की तुलना में अब भी ऊंचा स्तर माना जा रहा है।

पिछले छह महीने में चांदी ने जो रैली (rally) दिखाई उसने कई रिटेल निवेशकों को पहली बार गोल्ड से हटकर सिल्वर की तरफ देखने पर मजबूर किया है।

ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म्स के हिस्टॉरिकल डेटा बताते हैं कि 2025 के दौरान चांदी की कीमतें साल भर में 100 प्रतिशत से ज्यादा तक चढ़ीं जबकि सोना तुलनात्मक रूप से धीमी लेकिन स्थिर रफ्तार से ऊपर गया।

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चांदी की असली कहानी में कमी भी ओर काम भी

सिर्फ प्राइस चार्ट से चांदी की कहानी पूरी नहीं समझी जा सकती, तस्वीर इसके पीछे की डिमांड–सप्लाई से साफ होती है। इंटरनेशनल एजेंसियों के अनुमानों के मुताबिक ग्लोबल सिल्वर मार्केट लगातार कई साल से उत्पादन घाटे (supply deficit) में चल रहा है यानी खपत उत्पादन से ज्यादा है।

मित्रों खास बात यह है कि करीब 70% चांदी माइनिंग के दौरान दूसरे धातुओं के साथ बाय-प्रोडक्ट (by-product) के रूप में निकलती है इसलिए कीमतें बढ़ने पर भी सप्लाई उतनी तेजी से नहीं बढ़ पाती।

उधर इंडस्ट्रियल डिमांड ने तस्वीर पूरी तरह बदल दी है। सोलर पैनल, इलेक्ट्रिक वाहन, इलेक्ट्रॉनिक्स, 5G इंफ्रास्ट्रक्चर और मेडिकल डिवाइस जैसी इंडस्ट्री में चांदी की खपत लगातार नए रिकॉर्ड बना रही है जिसकी वजह से कुल ग्लोबल कंजम्पशन (global consumption) का लगभग 60% हिस्सा अब इंडस्ट्रियल यूज़ से आ रहा है।

यही वजह है कि चांदी अब सिर्फ ज्वेलरी मेटल नहीं रहा बल्कि एक dual-role asset बन चुकी है – एक तरफ यह इंडस्ट्रियल मेटल है दूसरी तरफ महंगाई और करेंसी रिस्क से बचाव के लिए इन्वेस्टमेंट ऑप्शन भी।

सोना अब भी भरोसे की ढाल बना हुआ है

सोना पारंपरिक तौर पर भारतीय घरों और वैश्विक बाज़ार में सुरक्षा की ढाल (hedge) माना जाता रहा है और यह भूमिका 2026 में भी अचानक खत्म नहीं होने वाली। गोल्ड के ताज़ा डेटा दिखाते हैं कि बीते एक साल में इसकी कीमतें भी मजबूत रही हैं हालांकि उतार–चढ़ाव चांदी की तुलना में कम दिखा।

जानकारों के मुताबिक जब–जब भू–राजनीतिक तनाव (geopolitical risk), युद्ध, महंगाई या ग्रोथ की अनिश्चितता बढ़ती है सोने की तरफ फंड्स की शिफ्टिंग (flight to safety) तेज हो जाती है।

दूसरी ओर जब ब्याज दरें बहुत ऊंची नहीं हों और इक्विटी–कमोडिटी में रिस्क लेने की भूख बढ़े तो गोल्ड की रफ्तार कुछ समय के लिए धीमी दिख सकती है जैसा कि फिलहाल सीमित दायरे में ट्रेडिंग से संकेत मिल रहा है।

कई सेंट्रल बैंक बीते सालभर से लगातार गोल्ड रिज़र्व बढ़ा रहे हैं जो यह साफ संदेश देता है कि लंबी अवधि के लिए सोना अब भी ग्लोबल फाइनेंशियल सिस्टम (global financial system) की बैकबोन बना हुआ है।

2026 चांदी का साल या सोने का रहेगा?

कमोडिटी एनालिस्ट्स का मानना है कि अगर इंडस्ट्रियल डिमांड उम्मीद के मुताबिक बनी रही और सप्लाई घाटा और गहराया, तो 2026 में भी चांदी में तेज़ और वॉलेटाइल (volatile) मूवमेंट देखने को मिल सकते हैं। कुछ रिसर्च रिपोर्ट्स ने तो घरेलू बाज़ार में चांदी के दाम 2.4 लाख रुपये प्रति किलो से ऊपर जाने की संभावना पहले ही जताई थी जो 2025 के अंत तक लगभग हकीकत के करीब पहुंच गए।

हालांकि यही वॉलेटिलिटी आम छोटे निवेशक के लिए रिस्क का दूसरा नाम भी है क्योंकि तेज़ रैली के बाद गहरे करेक्शन (sharp correction) भी सिल्वर मार्केट की पहचान माने जाते हैं।

इसके उलट गोल्ड में आमतौर पर तेज स्पाइक कम और ग्रेजुअल अपसाइड (gradual upside) ज्यादा दिखती है। 2025 के दौरान भी गोल्ड ने साल–दर–साल आधार पर मजबूत रिटर्न दिए लेकिन रास्ते में उतने बड़े झटके नहीं दिखे जितने सिल्वर में दिखे।

इसीलिए कई फाइनेंशियल प्लानर सुझाव दे रहे हैं कि 2026 को सिर्फ चांदी का साल कहने के बजाय इसे हाई–रिस्क हाइ–रिटर्न चांदी और स्टेबल गोल्ड के कॉम्बिनेशन के रूप में देखना ज्यादा समझदारी होगी।

आम निवेशक के लिए आसान प्लान

रिटेल इन्वेस्टर के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि पोर्टफोलियो (portfolio) कैसे बैलेंस किया जाए। एक्सपर्ट्स का एक आम सुझाव यह है कि कीमती धातुओं में कुल निवेश को सीमित रखकर उसमें भी गोल्ड और सिल्वर के बीच डाइवर्सिफिकेशन (diversification) किया जाए ताकि एक तरफ ग्रोथ का मौका रहे और दूसरी तरफ सुरक्षा भी बनी रहे।

जिन निवेशकों को रोज–रोज प्राइस देखने से तनाव होता है और लंबी अवधि की नींद (peace of mind) ज्यादा जरूरी लगती है वे गोल्ड–सेंट्रिक एप्रोच चुनते हैं जबकि थोड़ा ज्यादा रिस्क उठाने वाले युवा निवेशक अपनी होल्डिंग में सिल्वर का हिस्सा बढ़ा रहे हैं।

साथ ही सलाहकार यह भी चेतावनी दे रहे हैं कि किसी भी एक कॉन्ट्रैक्ट या एक ही दिन की रैली देखकर पूरा पैसा किसी एक धातु में झोंक देना खतरनाक हो सकता है।

बेहतर यही है कि किस्तों में निवेश (systematic buying) किया जाए और फिजिकल ज्वेलरी के बजाय सिक्के, बार या डिजिटल गोल्ड–सिल्वर जैसे ऑप्शन पर भी विचार किया जाए जहां स्प्रेड और मेकिंग चार्ज (making charges) कम हों।

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Saloni Yadav

सलोनी यादव (Journalist): एक अनुभवी पत्रकार हैं जिन्होंने अपने 10 साल के करियर में कई अलग-अलग विषयों को बखूबी कवर किया है। उन्होंने कई बड़े प्रकाशनों के साथ काम किया है और अब NFL स्पाइस पर अपनी सेवाएँ दे रही हैं। सलोनी यादव हमेशा प्रामाणिक स्रोतों और अपने अनुभव के आधार पर जानकारी साझा करती हैं और पाठकों को सही और विश्वसनीय सलाह देती हैं। Contact Email: saloniyadav@nflspice.com Website: nflspice.com
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