• फरीदाबाद का वो केस जिसने न्याय के तराजू को भी हिला दिया
  • छह साल जेल की सलाखें और हत्या का दाग, फिर अचानक लौट आई ‘मरी हुई’ पत्नी
  • पुलिस की थ्योरी, पति का कबूलनामा और कानून के गलियारों में छिपी एक अधूरी कहानी

Haryana News: कानून की दुनिया में अक्सर कहा जाता है कि सबूत बोलते हैं, लेकिन फरीदाबाद के एक सनसनीखेज मामले ने इस दावे पर भी सवालिया निशान लगा दिए हैं। जिस शख्स को पुलिस ने अपनी फाइल में ‘कातिल’ लिख दिया था, जिस पति ने अपनी पत्नी के कत्ल के जुर्म में अपनी जिंदगी के बेशकीमती छह साल जेल की कालकोठरी में काट दिए, वह पत्नी अचानक जिंदा सामने आ गई। यह खबर सिर्फ एक कानूनी पेचीदगी नहीं है, बल्कि एक इंसान की जिंदगी के उन सालों की बर्बादी है जो अब कभी लौट कर नहीं आएंगे।

अडिशनल सेशन जज ज्योति लांबा की अदालत में जब यह मामला पहुंचा, तो वहां मौजूद हर शख्स सन्न रह गया। कानून के पन्नों में सुधा मर चुकी थी, लेकिन हकीकत में वह सांस ले रही थी। इस नाटकीय मोड़ ने पूरे केस की बुनियाद ही हिला कर रख दी। सवाल उठा कि अगर पत्नी जिंदा है, तो फिर वह कत्ल किसका था? और अगर कत्ल हुआ ही नहीं, तो पति ने पुलिस के सामने गुनाह कैसे कबूला था?

शक की वो काली रात और पुलिसिया दांवपेच

इस पूरी कहानी की शुरुआत साल 2019 की एक सर्द शाम से होती है। नई दिल्ली के रहने वाले मलखान ने सराय ख्वाजा थाने में एक शिकायत दर्ज कराई थी। उनकी बेटी सुधा की शादी 2005 में हाथरस के रहने वाले मुकेश उर्फ मनोज से हुई थी। छह बच्चों का यह परिवार फरीदाबाद में मजदूरी कर अपना गुजारा कर रहा था। 13 दिसंबर 2019 को सुधा और मुकेश काम पर निकले, लेकिन शाम को मुकेश अकेला लौटा। बच्चों को उसने बताया कि मां मायके चली गई है, लेकिन जब ननिहाल में सुधा नहीं मिली, तो शक की सुई मुकेश पर घूम गई।

पुलिस ने जब मुकेश को अपनी गिरफ्त में लिया, तो उसने जो कहानी सुनाई वह किसी थ्रिलर फिल्म जैसी थी। उसने पुलिस को बताया कि उसे अपनी पत्नी के चरित्र पर शक था, इसलिए उसने गुरुग्राम नहर के पास उस्तरे से उसका गला रेता और फिर चुन्नी से गला घोंटकर उसे मरा हुआ समझकर भाग गया। पुलिस के लिए केस ‘सॉल्व’ हो चुका था और मुकेश को जेल की सलाखों के पीछे भेज दिया गया।

अदालत का फैसला और एक अधूरा न्याय

सालों बाद जब सुधा जिंदा मिली, तो पुलिस की पूरी तफ्तीश कागजी शेर साबित हुई। अदालत ने पाया कि हत्या तो हुई ही नहीं, लेकिन क्योंकि मुकेश ने जान लेने की नीयत से हमला करने की बात कबूली थी, इसलिए कोर्ट ने उस पर लगी हत्या की धारा (302) को हटाकर उसे हत्या के प्रयास (307) का दोषी माना।

अदालत ने उसे छह साल की सजा सुनाई, लेकिन विडंबना देखिए कि मुकेश पहले ही छह साल से ज्यादा का वक्त जेल में गुजार चुका था। जज ने उसकी सजा को ‘अंडरगोन’ (भुगता हुआ) माना और 13 हजार रुपये का जुर्माना लगाकर उसे रिहा करने का आदेश दिया। मुकेश आज आजाद तो है, लेकिन समाज की नजरों में उसकी पहचान और उसके परिवार का बिखर जाना एक ऐसा घाव है, जिसकी भरपाई शायद कोई भी फैसला नहीं कर सकता। यह मामला हमारे सिस्टम की उन कमियों को उजागर करता है जहां कभी-कभी ‘कबूलनामे’ हकीकत से कोसों दूर होते हैं।

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