गाजियाबाद में जहरीले नाले से त्रस्त युवक ने मांगी इच्छा मृत्यु, डेढ़ लाख लोगों पर मंडराया खतरा

Haryana News: गाजियाबाद के बृज विहार में रहने वाले 45 वर्षीय हेमंत भारद्वाज ने रविवार को एक ऐसा कदम उठाया, जिसने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया। सालों से बदहाल पड़े नाले की वजह से लगातार बीमारियों, बदबू और जहरीली गैसों के बीच जीवन बिताने को मजबूर हेमंत ने राष्ट्रपति और देश के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर इच्छामृत्यु की मांग की है।

हेमंत ने विरोध दर्ज कराने के लिए इस biting cold में सीधे नाले के भीतर उतरकर प्रशासन को एक करारा सवाल दे मारा—”क्या हम इंसान हैं या इस जहरीले धुएं में घुटने के लिए छोड़ दिए गए हैं?”

26 साल पुराने नाले की कहानी

स्थानीय निवासियों के मुताबिक, करीब 26 वर्ष पहले यह नाला सिर्फ बरसात का पानी निकालने के लिए बनाया गया था। लेकिन समय के साथ इसमें साहिबाबाद औद्योगिक क्षेत्रों, निजी अस्पतालों और फैक्ट्रियों का गंदा पानी और मेडिकल कचरा भी बहाया जाने लगा।

आज हाल यह है कि नाले से उठती जहरीली गैसें इतनी तीखी हो चुकी हैं कि लोग घरों में सांस लेने से डरने लगे हैं। निवासियों का कहना है कि गैसों के कारण आंखों में जलन, त्वचा रोग, लगातार सिरदर्द और सांस लेने में परेशानी आम हो चुकी है।

सिर्फ आश्वासन मिले लेकिन समाधान नहीं

हेमंत बताते हैं कि वे कई सालों से नगर निगम और जनप्रतिनिधियों से गुहार लगा रहे हैं। शिकायतें दर्ज हुईं, अधिकारियों के दौरे भी हुए, लेकिन नाले की स्थिति जस की तस है।

लोगों की पीड़ा सिर्फ स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है — नाले से उठता कार्बन घरों के इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की पीसीबी पर जम जाता है, जिससे टीवी, फ्रिज और कूलर तक जल्दी खराब हो जाते हैं।

बारिश में बी और सी ब्लॉक पानी में डूबते हैं

बरसात आते ही समस्या भयावह रूप ले लेती है। नाला ओवरफ्लो होकर बी और सी ब्लॉक के घरों में घुस जाता है, खासतौर पर ग्राउंड फ्लोर वाले परिवार सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं।

नाले की चौड़ाई बढ़ाने का प्रयास भी समस्या को हल नहीं कर पाया—उल्टा पानी अब वापस कॉलोनी की ओर लौटने लगा।

डेढ़ लाख आबादी ख़तरे में

डेल्टा कॉलोनी और आसपास की लगभग 1.5 लाख आबादी पिछले कई वर्षों से इस पर्यावरणीय संकट के बीच जी रही है। जब प्रशासनिक चक्करों के बाद भी कोई सुनवाई नहीं हुई, तो हेमंत को लगा कि उनके पास विकल्प ही क्या बचा है।

“अगर जीना ही मौत जैसा हो जाए, तो इच्छा मृत्यु ही राहत लगती है,”—हेमंत का यह बयान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है और कई लोग इसे सिस्टम की विफलता का सबसे कड़ा सबूत बता रहे हैं।

अब देखना यह है कि हेमंत की इस चरम मांग पर क्या सरकार कोई ठोस कदम उठाती है या यह आवाज भी बाकी शिकायतों की तरह कागज़ों में ही गुम हो जाएगी।

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