मकर संक्रांति पर कुतीना गोशाला में उमड़ी भीड़, युवाओं ने घर-घर जाकर जुटाया 125 मन अनाज और लाखों का दान

Rewari News: जब नीयत साफ हो और इरादे नेक, तो समाज की शक्ति क्या कर सकती है, इसकी जीती-जागती तस्वीर मकर संक्रांति के पावन अवसर पर कुतीना में देखने को मिली। रेवाड़ी और आसपास के ग्रामीण अंचलों में त्योहार तो हर साल आते हैं, लेकिन इस बार कुतीना स्थित बाबा कुंदन दास गोशाला में जो नज़ारा दिखा, उसने भक्ति और सेवा के मायने ही बदल दिए।
आमतौर पर युवा पीढ़ी को लेकर तमाम तरह की बातें होती हैं, लेकिन यहां के करीब 50 युवाओं की टोली ने जिस तरह से गोसेवा के लिए कमर कसी, उसने बड़ों का भी सिर फख्र से ऊंचा कर दिया। सर्दी की परवाह किए बिना सुबह की पहली किरण के साथ ही खंडोड़ा, कांकर, कुतीना, शाहजहांपुर और बटाना की गलियों में ‘गोमाता की जय’ के नारे गूंजने लगे थे। यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं था, बल्कि अपनी जड़ों और संस्कृति से जुड़ने का एक बड़ा माध्यम बन गया।
गांव-दर-गांव चली दान की बयार
सेवा का यह कारवां इतना प्रभावशाली था कि इन पांच गांवों के हर घर से लोगों ने दिल खोलकर दान दिया। युवाओं की टीम जब घर-घर पहुंची, तो बुजुर्गों ने आशीर्वाद दिया और महिलाओं ने अपनी सामर्थ्य से बढ़कर गोशाला के लिए हिस्सा निकाला। शाम होते-होते गोशाला परिसर अनाज और पशु आहार से भर चुका था।
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आंकड़ों की बात करें तो करीब 125 मन अनाज और लगभग ढाई लाख रुपये की कीमत की खल एकत्रित हुई। इसमें 50 बैग खल और 65 पेटी गुड़ भी शामिल रहा। गुड़ की मिठास और श्रद्धालुओं की श्रद्धा ने गोशाला के वातावरण को पूरी तरह आध्यात्मिक बना दिया।
जिम्मेदारी का जज्बा और युवाओं का समर्पण
इस पूरे अभियान की रीढ़ वो युवा रहे जिन्होंने अपनी छुट्टी और आराम को दरकिनार कर दिया। परमजीत सिंह, अमू, आनंद और मनोज जैसे युवाओं ने जिस तरह से तालमेल बिठाया, वह किसी मैनेजमेंट क्लास से कम नहीं था। उनके साथ संदीप, कन्नू, सुनील, प्रदीप, मोसम और हरिओम सिंह ने भी दिन भर पसीना बहाया। इन युवाओं का कहना था कि गोसेवा केवल पुण्य का काम नहीं है, बल्कि यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम अपनी मूक माताओं का ख्याल रखें।
परिसर में सुबह से ही गणमान्य व्यक्तियों की मौजूदगी ने युवाओं का उत्साह दोगुना कर दिया। वकील विनोद चौहान, विक्रम सिंह और पूर्व शिक्षक लीलाराम चौधरी जैसे अनुभवी लोग खुद मौके पर डटे रहे। नवीन शर्मा, पृथ्वी सिंह और कंवरपाल सिंह ने भी प्रबंधन में हाथ बंटाते हुए सुनिश्चित किया कि दान की एक-एक सामग्री सही तरीके से गोशाला तक पहुंचे।
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सामूहिक प्रयास से ही संभव है संरक्षण
गोशाला प्रबंधन ने इस अभूतपूर्व सहयोग पर आभार जताते हुए एक बड़ी बात कही। उन्होंने साफ किया कि सरकार या कोई एक व्यक्ति अकेले इतनी बड़ी व्यवस्था नहीं चला सकता। जब समाज अपने संसाधनों और श्रम का हिस्सा निकालता है, तभी गोसेवा जैसे पुनीत कार्य फलीभूत होते हैं। शाम ढलते-ढलते श्रद्धालु जब अपने घरों को लौटे, तो उनके चेहरे पर एक अजब सा संतोष था। मकर संक्रांति के पर्व पर किसी प्यासे को पानी और बेजुबान को चारा देने का संतोष।
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