राम रहीम को 15वीं बार पैरोल: 40 दिन की रिहाई होगी, चुनावी टाइमिंग पर फिर उठे सवाल
डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम को हरियाणा सरकार ने 40 दिन की पैरोल दी है। यह 15वीं बार है जब वह सजा के दौरान बाहर आएगा। बार-बार और चुनावी समय पर मिल रही रिहाई ने नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
- राम रहीम को 15वीं बार पैरोल, 40 दिन के लिए जेल से बाहर
- चुनावी समय से जुड़ती रिहाई की टाइमिंग पर फिर सवाल
- सजा और अपराधों का लंबा इतिहास, लेकिन राहत जारी
- सरकार की भूमिका पर विपक्ष और समाज में असहजता
हरियाणा सरकार ने एक बार फिर सिरसा स्थित डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख Gurmeet Ram Rahim Singh को राहत दी है। इस बार उसे 40 दिनों की पैरोल मिली है। यह 15वीं बार है जब वह सजा के दौरान जेल से बाहर आएगा। पैरोल की खबर सामने आते ही राजनीतिक गलियारों से लेकर आम लोगों के बीच बहस तेज हो गई है।
राम रहीम इस समय अपनी दो शिष्याओं से बलात्कार के मामले में 20 साल की सजा काट रहा है। अदालत ने दोनों मामलों में अलग-अलग 10-10 साल की सजा सुनाई थी। इसके बावजूद बीते वर्षों में उसकी रिहाई की आवृत्ति ने कई सवाल खड़े किए हैं। खासकर इसलिए क्योंकि हर बार पैरोल की टाइमिंग किसी न किसी चुनावी माहौल से जुड़ती दिखी है।
पहले भी मिलती रही राहत
यह पहली बार नहीं है जब राम रहीम बाहर आया हो। पिछले साल अगस्त में भी उसे 40 दिन की पैरोल मिली थी। उस दौरान वह Dera Sacha Sauda के मुख्यालय में रहा और वहां सत्संग व प्रवचन किए। इससे पहले जनवरी में 20 दिन की पैरोल और अप्रैल में 21 दिन की फरलो भी दी जा चुकी है।
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इन रिहाइयों का सिलसिला यहीं नहीं रुकता। बीते कुछ वर्षों पर नजर डालें तो साफ दिखता है कि चुनावी समय के आसपास उसे बार-बार बाहर आने की अनुमति मिली। अक्टूबर 2020 में हरियाणा विधानसभा चुनाव के दौरान 40 दिन की पैरोल, फरवरी 2022 में पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले 21 दिन की फरलो, जून 2022 में हरियाणा निकाय चुनाव के समय एक महीने की पैरोल और अक्टूबर 2022 में हरियाणा उपचुनाव के दौरान फिर 40 दिन की पैरोल दी गई थी।
अपराधों का लंबा साया
राम रहीम को 2017 में दो साध्वियों से बलात्कार के मामले में दोषी ठहराया गया था। इसके बाद 2019 में पत्रकार राम चंद्र छत्रपति की हत्या के केस में भी उसे सजा मिली। 2002 में अपने मैनेजर रंजीत सिंह की हत्या के मामले में उसे उम्रकैद हुई थी हालांकि मई 2024 में जांच को दोषपूर्ण और संदिग्ध मानते हुए उसे और अन्य आरोपियों को बरी कर दिया गया।
इन मामलों की गंभीरता को देखते हुए समाज के एक बड़े हिस्से में यह सवाल बार-बार उठता है कि क्या कानून का पैमाना सभी के लिए एक जैसा है। विपक्षी दल भी सरकार पर नरमी बरतने का आरोप लगाते रहे हैं।
सरकार की चुप्पी, सवाल कायम
हरियाणा सरकार की ओर से पैरोल को कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा बताया जाता रहा है। लेकिन लगातार मिल रही राहत और उसकी टाइमिंग ने संदेह को और गहरा किया है। आम लोगों के मन में यह सवाल अब भी बना हुआ है कि क्या ऐसे मामलों में संवेदनशीलता और सख्ती का संतुलन सही बैठ रहा है।
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