Yamunanagar Stone Crusher: क्या बंद होंगे 217 स्टोन क्रशर? NGT की पहली सुनवाई में ही मचा हड़कंप, अब 4 हफ्ते का अल्टीमेटम!

यमुनानगर में 217 स्टोन क्रशर इकाइयों द्वारा नियमों के उल्लंघन पर NGT ने सख्त रुख अपनाया है। जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव की पीठ ने 4 हफ्ते में अंतिम रिपोर्ट मांगी है। जांच में कई इकाइयां गायब मिलीं तो कई मानकों पर फेल पाई गईं। अब इन पर बड़ी कार्रवाई की तलवार लटक रही है।

  • NGT की पहली सुनवाई में तीखे तेवर
  • संयुक्त समिति को चार हफ्ते की डेडलाइन
  • नियमों की धज्जियां उड़ाते मिले 51 क्रशर
  • यमुनानगर के ‘धूल के गुबार’ पर सख्त कार्रवाई

नई दिल्ली: यमुनानगर में पत्थरों को पीसने वाली मशीनों के शोर और उससे उठने वाले धूल के गुबार ने अब देश की सबसे बड़ी ‘ग्रीन अदालत’ को नाराज कर दिया है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) की प्रधान पीठ ने 217 स्टोन क्रशर इकाइयों के मामले में पहली ही सुनवाई में स्पष्ट कर दिया है कि पर्यावरण से खिलवाड़ किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए संयुक्त समिति को साफ लहजे में कह दिया है— “हमें चार हफ्तों के भीतर फाइनल रिपोर्ट चाहिए।”

ग्राउंड जीरो की हकीकत: कागजों पर कुछ, मौके पर कुछ

हैरानी की बात यह है कि जब जांच शुरू हुई, तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। कुल 217 इकाइयों में से 40 तो मौके पर मिली ही नहीं, मानो वे सिर्फ कागजों पर ही सांस ले रही थीं। 50 इकाइयों पर प्रदूषण बोर्ड पहले ही ताला जड़ चुका है, लेकिन असली खेल उन 51 इकाइयों में देखने को मिला जो निरीक्षण के दौरान ‘बंद’ पाई गईं। रिपोर्ट कहती है कि ये 51 क्रशर भले ही उस वक्त नहीं चल रहे थे, लेकिन पर्यावरणीय मानकों (Environmental Norms) की कसौटी पर ये पूरी तरह फेल साबित हुए।

इन क्रशर परिसरों में न तो धूल रोकने के लिए फव्वारे थे और न ही प्रदूषण कंट्रोल करने वाले उपकरणों की कोई सुध ली गई थी।

कायदे-कानूनों की लंबी फेहरिस्त, पर पालन शून्य

पर्यावरणविद डॉ. केआर भारद्वाज की मानें तो नियम बेहद कड़े हैं, लेकिन धरातल पर उनकी धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। नियमानुसार, एक स्टोन क्रशर को नेशनल हाईवे से कम से कम 500 मीटर और किसी भी अस्पताल या स्कूल से 1 किलोमीटर दूर होना चाहिए। लेकिन यमुनानगर के कई इलाकों में इन दूरियों का हिसाब-किताब सिर्फ फाइलों तक सीमित रह गया है।

“जब मौके पर जांच हुई तो न तो दो कतारों में पौधारोपण मिला और न ही पक्के रास्ते। धूल को दबाने के लिए जरूरी 50 फव्वारों का तो नामोनिशान भी नहीं था।”

अब आगे क्या?

NGT ने अब गेंद प्रशासन के पाले में डाल दी है। 17 फरवरी की प्रगति रिपोर्ट ने जो आईना दिखाया है, उससे साफ है कि हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (HSPCB) पर भी दबाव बढ़ेगा। 127 क्रशर जो फिलहाल चल रहे हैं, उनकी सांसें भी अब इस चार हफ्ते की डेडलाइन पर टिकी हैं। अगर मानकों में सुधार नहीं हुआ, तो यमुनानगर के पत्थर उद्योग पर बड़ी गाज गिरना तय है।

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