Working Women Safety Index 2025: बेंगलुरु और चेन्नई महिलाओं के लिए सबसे सुरक्षित, दिल्ली-नोएडा की रैंकिंग ने चौंकाया
TCWI 2025 की रिपोर्ट के अनुसार बेंगलुरु महिलाओं के लिए देश का सबसे सुरक्षित और करियर-फ्रेंडली शहर बना है। जानें चेन्नई, मुंबई और दिल्ली-एनसीआर की रैंकिंग और क्या कहते हैं सुरक्षा के आंकड़े।
- बेंगलुरु बना कामकाजी महिलाओं की पहली पसंद, सुरक्षा और करियर में चेन्नई भी नहीं है पीछे
- देश के 125 शहरों की पड़ताल में दक्षिण भारत का दबदबा, टियर-2 शहरों ने भी दिखाई ताकत
- दिल्ली और नोएडा में काम के मौके तो खूब हैं, लेकिन सुरक्षा और मोबिलिटी के मोर्चे पर अब भी है चुनौती
Working Women Safety Index 2025: जब एक बेटी घर से बाहर निकलकर किसी दूसरे शहर में करियर बनाने का सपना देखती है, तो उसके माता-पिता के मन में सबसे पहला सवाल ‘सैलरी’ का नहीं, बल्कि सुरक्षा का आता है। क्या वह शहर रात की शिफ्ट के बाद उसे सुरक्षित घर पहुँचाएगा? क्या वहाँ का माहौल उसे बराबरी का हक देगा? इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश की है अवतार ग्रुप की ताज़ा टॉप सिटीज फॉर वीमेन इन इंडिया (TCWI) 2025 रिपोर्ट ने। इस रिपोर्ट के आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि अगर महिलाओं के सपनों को पंख देने की बात हो तो देश की आईटी राजधानी बेंगलुरु आज भी सबसे मज़बूत ठिकाना बनी हुई है।
बेंगलुरु ने 53.29 के शानदार स्कोर के साथ इस फेहरिस्त में पहला स्थान हासिल किया है। यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि उन हज़ारों कामकाजी महिलाओं के भरोसे की जीत है जो इस शहर की हवाओं में खुद को आज़ाद और सुरक्षित महसूस करती हैं। बेंगलुरु की सबसे बड़ी ताकत यहाँ का ‘इंडस्ट्री सपोर्ट’ है। यहाँ की कंपनियाँ सिर्फ नौकरी नहीं देतीं, बल्कि एक ऐसा ईकोसिस्टम तैयार करती हैं जहाँ महिलाओं के लिए आगे बढ़ने के रास्ते बंद नहीं होते।
चेन्नई की सुरक्षा और मुंबई की जद्दोजहद
इस दौड़ में चेन्नई बहुत मामूली अंतर से दूसरे नंबर पर है। दिलचस्प बात यह है कि जहाँ बेंगलुरु करियर के मौकों में आगे है, वहीं चेन्नई ने सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और पब्लिक ट्रांसपोर्ट के मामले में बाजी मारी है। चेन्नई की सड़कों पर एक महिला देर रात भी खुद को महफूज़ पाती है, और यही वह सामाजिक ताना-बाना है जो उसे खास बनाता है।
इस सूची में पुणे, हैदराबाद और मुंबई ने भी अपनी जगह टॉप 5 में बरकरार रखी है। मुंबई के बारे में रिपोर्ट एक कड़वा सच भी बयां करती है की यहाँ काम की कोई कमी नहीं है लेकिन आसमान छूती महंगाई और भीड़भाड़ वाला इन्फ्रास्ट्रक्चर आज भी महिलाओं के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
सिर्फ बड़े शहरों की कहानी नहीं रही अब
इस बार की रिपोर्ट में एक सुखद बदलाव देखने को मिला है। अब महिलाओं के लिए सुरक्षित माहौल सिर्फ दिल्ली, मुंबई या बेंगलुरु जैसे महानगरों तक सीमित नहीं रह गया है। 2025 की इस रिपोर्ट में टियर-2 शहरों ने अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। यह इस बात का संकेत है कि छोटे शहरों का प्रशासन और वहाँ का समाज अब अपनी बेटियों के लिए ज़्यादा संवेदनशील और समावेशी हो रहा है।
तिरुवनंतपुरम और शिमला जैसे शहरों ने सामाजिक सुरक्षा में तो झंडे गाड़े हैं, लेकिन रिपोर्ट का इशारा यह भी है कि इन खूबसूरत शहरों को अभी रोज़गार के और ज़्यादा अवसर पैदा करने की ज़रूरत है ताकि यहाँ की प्रतिभा को पलायन न करना पड़े।
दिल्ली-एनसीआर: चमक ज़्यादा, सुकून कम?
जब हम दिल्ली, गुरुग्राम और नोएडा की बात करते हैं, तो यहाँ का नजारा थोड़ा अलग दिखता है। रोज़गार और बड़ी कंपनियों के मामले में ये शहर किसी से कम नहीं हैं, लेकिन जब बात आती है सुरक्षा, मोबिलिटी और जीवन जीने की सुगमता की तो ये पिछड़ जाते हैं।
हालांकि गुरुग्राम के लिए एक अच्छी खबर यह है कि उसने पिछले साल के मुकाबले अपनी रैंकिंग सुधारी है। इसका मतलब है कि ज़मीनी स्तर पर बदलाव की कोशिशें शुरू हो चुकी हैं लेकिन मंज़िल अभी दूर है।
दक्षिण का दम और उत्तर की चुनौतियाँ
अगर हम नक्शे पर नज़र डालें, तो दक्षिण भारत के शहरों ने उत्तर, मध्य और पूर्वी भारत को काफी पीछे छोड़ दिया है। दक्षिण के शहरों में ‘सोशल इन्क्लूजन’ यानी सामाजिक समावेशन की जड़ें काफी गहरी हैं। इसके उलट, मध्य और पूर्वी भारत के शहरों को अभी लंबा सफर तय करना है। पश्चिम भारत, खासकर महाराष्ट्र और गुजरात के शहरों ने इंडस्ट्री में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने में अच्छा काम किया है।
अंत में, यह रिपोर्ट सिर्फ एक रैंकिंग नहीं, बल्कि उन शहरों के लिए आईना है जो ‘स्मार्ट’ बनने का दावा तो करते हैं, लेकिन अपनी आधी आबादी को एक निडर माहौल देने में अब भी जूझ रहे हैं। बदलाव की सुगबुगाहट शुरू हो चुकी है, उम्मीद है कि अगली रिपोर्ट में ये दूरियां और कम होंगी।



