Teesta Project: बांग्लादेश में चीनी राजदूत की हलचल, भारत के सिलीगुड़ी कॉरिडोर के पास बढ़ता खतरा
बांग्लादेश में चीनी राजदूत याओ वेन ने तीस्ता नदी परियोजना क्षेत्र का दौरा किया है। भारत के 'चिकन नेक' के पास चीन की इस सक्रियता ने सुरक्षा चिंताएं बढ़ा दी हैं। जानिए क्या है चीन का मास्टर प्लान।
- भारत की दहलीज तक पहुंचा चीन, तीस्ता नदी के बहाने सिलीगुड़ी कॉरिडोर के पास बढ़ाई हलचल
- बांग्लादेश की नई सरकार और चीनी राजदूत की जुगलबंदी ने बढ़ाई दिल्ली की धड़कन
- चिकन नेक के करीब ड्रैगन की एंट्री, क्या विकास के नाम पर सरहद पर रची जा रही है कोई बड़ी साजिश
- ममता बनर्जी के विरोध और दशकों से लटके तीस्ता समझौते का फायदा उठाने की फिराक में बीजिंग
भारत और बांग्लादेश के बीच के रिश्तों में आई कड़वाहट के बीच अब पड़ोस से एक ऐसी खबर आ रही है जो रक्षा जानकारों की नींद उड़ाने के लिए काफी है। सोमवार को बांग्लादेश में चीन के राजदूत याओ वेन अचानक तीस्ता नदी परियोजना के इलाके में पहुंच गए।
पहली नजर में यह एक सामान्य दौरा लग सकता है लेकिन नक्शे पर नजर डालेंगे तो समझ आएगा कि चीन की नजर असल में कहां है। यह पूरा इलाका भारत के उस ‘चिकन नेक’ यानी सिलीगुड़ी कॉरिडोर के बेहद करीब है, जो हमारे पूरे उत्तर-पूर्व को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ता है।
सरहद पर चीन की नई बिसात
चीनी राजदूत का इस संवेदनशील इलाके में घूमना सिर्फ एक संयोग नहीं हो सकता। मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार भले ही इसे तकनीकी जांच बताकर पल्ला झाड़ रही हो लेकिन दाल में कुछ काला जरूर नजर आ रहा है।
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बांग्लादेश की जल संसाधन सलाहकार सैयदा रिजवाना हसन का कहना है कि चीन इस प्रोजेक्ट को जल्द से जल्द शुरू करना चाहता है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि अभी तकनीकी मूल्यांकन होना बाकी है, पर बीजिंग की हड़बड़ी बता रही है कि वह इस इलाके में अपने पैर जमाने के लिए कितना बेताब है।
हैरानी की बात यह है कि इस दौरे से ठीक एक दिन पहले चीनी राजदूत ने बांग्लादेश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार खलीलुर रहमान के साथ लंबी बैठक की थी। इस मुलाकात में न सिर्फ तीस्ता प्रोजेक्ट पर बात हुई बल्कि चीन ने बांग्लादेश के आने वाले चुनावों में भी अपना पूरा समर्थन देने का वादा कर दिया। जानकारों का मानना है कि चीन अब बांग्लादेश के जरिए भारत को घेरने की नई घेराबंदी कर रहा है।
क्या है ये तीस्ता मास्टर प्लान?
चीन जिस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ा रहा है, उसे ‘तीस्ता मास्टर प्लान’ का नाम दिया गया है। इसमें नदी की गहरी खुदाई, बड़े-बड़े तटबंधों का निर्माण और नए बैराज बनाना शामिल है। सुनने में यह विकास का काम लगता है लेकिन भारत के लिए चिंता की बात यह है कि इन निर्माण कार्यों के बहाने चीन के इंजीनियर और भारी मशीनरी हमारी सीमा के एकदम करीब तैनात हो जाएंगे।
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रक्षा विशेषज्ञों को डर है कि विकास की आड़ में चीन यहां अपनी निगरानी चौकियां बना सकता है, जिससे सिलीगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा को सीधा खतरा पैदा हो जाएगा।
पुरानी रंजिश और पड़ोसी की मजबूरी
अगर हम पीछे मुड़कर देखें तो तीस्ता जल समझौता पिछले 14 सालों से ठंडे बस्ते में पड़ा है। 2011 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ढाका गए थे, तो समझौता लगभग फाइनल था। लेकिन पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के कड़े विरोध की वजह से दिल्ली को कदम पीछे खींचने पड़े।
ममता का तर्क आज भी वही है कि अगर पानी बांग्लादेश को दे दिया गया, तो उत्तर बंगाल के जिले सूखे की चपेट में आ जाएंगे।
इसी राजनीतिक खींचतान और पानी के बंटवारे पर मचे घमासान का फायदा अब चीन उठा रहा है। बांग्लादेश में जब से सत्ता परिवर्तन हुआ है और शेख हसीना की विदाई हुई है ढाका का झुकाव बीजिंग की तरफ साफ दिखने लगा है।
मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस ने खुद बीजिंग से आर्थिक मदद की गुहार लगाई है। भारत के लिए यह दोहरा झटका है – एक तरफ पुराना दोस्त हाथ से छिटकता दिख रहा है तो दूसरी तरफ जानी दुश्मन दरवाजे पर दस्तक दे रहा है।
बदलते हालात और भारत की चुनौती
दिसंबर के महीने में ढाका की सड़कों पर जिस तरह के भारत विरोधी प्रदर्शन हुए, उसने साफ कर दिया था कि आने वाला समय आसान नहीं होगा। अब चीनी राजदूत का सीधे प्रोजेक्ट साइट पर पहुंचना दिल्ली के लिए एक कड़ा संदेश है।
सवाल सिर्फ पानी का नहीं है, सवाल उस जमीन का है जो सामरिक रूप से भारत की जीवन रेखा मानी जाती है। अगर चीन इस इलाके में अपनी पकड़ मजबूत करता है, तो भारत के लिए अपने पूर्वोत्तर राज्यों के साथ संपर्क बनाए रखना एक बड़ी चुनौती बन सकता है।
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