नोबेल के रास्ते पर चीन? भारत-पाक विवाद में ‘मध्यस्थ’ बनने के दावे ने बढ़ाई हलचल
अमेरिका के बाद अब चीन ने भी दावा किया है कि उसने भारत-पाकिस्तान के बीच हालिया तनाव में ‘शांति’ की भूमिका निभाई थी। भारत ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा है कि यह मुद्दा दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों ने आपसी बातचीत से सुलझाया था।
- चीन ने किया दावा – भारत-पाक संघर्ष में निभाई ‘मध्यस्थ’ की भूमिका
- भारत ने कहा – किसी तीसरे पक्ष की दखल की ज़रूरत नहीं
- क्या शी जिनपिंग नोबेल की राह पर हैं? नया सवाल खड़ा
- कूटनीति और आलोचना के बीच चीन की बढ़ती वैश्विक महत्वाकांक्षा
China Mediation Claim: बीजिंग में मंगलवार को आयोजित वार्षिक विदेश नीति संवाद में चीन के विदेश मंत्री वांग यी (Wang Yi) ने जो कहा, उसने नई बहस को जन्म दे दिया। उन्होंने गर्व से ऐलान किया कि 2025 में चीन ने दुनिया के कई “हॉटस्पॉट मुद्दों” में मध्यस्थता (mediation) की, जिनमें भारत-पाकिस्तान के बीच हुआ सीमा तनाव भी शामिल है।
उनके इस बयान के बाद ये सवाल उठने लगे हैं की क्या राष्ट्रपति शी जिनपिंग (Xi Jinping) डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) की तरह ‘नोबेल शांति पुरस्कार’ की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं? या फिर यह कूटनीति (diplomacy) के नाम पर नया पावर-प्रोजेक्शन है?
भारत का सख्त जवाब – “मसला हमने खुद सुलझाया”
नई दिल्ली ने चीन के दावे को सिरे से खारिज कर दिया। विदेश मंत्रालय ने साफ कहा कि मई 2025 का तनाव दोनों देशों के डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशंस (DGMO) के बीच सीधी बातचीत से सुलझा था।
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13 मई को हुई प्रेस ब्रीफिंग में मंत्रालय ने यह स्पष्ट किया था कि संघर्षविराम की शर्तें 10 मई को दोपहर 3:35 बजे हुई कॉल में तय हुईं। भारत का रुख हमेशा यही रहा है – भारत-पाक मुद्दों में किसी तीसरे देश की भूमिका नहीं है।
“ऑपरेशन सिंदूर” और चीन की दोहरी भूमिका
मई 2025 में हुए सैन्य टकराव, जिसे भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ (Operation Sindoor) नाम दिया, उस वक्त चीन पर आरोप लगे कि उसने पाकिस्तान को सैन्य सहयोग दिया। भारतीय सेना के उप प्रमुख ले. जनरल राहुल आर. सिंह ने तो यहां तक कहा था कि चीन ने इस संघर्ष को “लाइव लैब” (live lab) की तरह इस्तेमाल किया।
उन्होंने आरोप लगाया कि बीजिंग ने ‘उधार के चाकू से वार’ की नीति अपनाई – यानि किसी और के जरिए लक्ष्य साधा। चीन ने इन आरोपों पर कोई सीधा जवाब नहीं दिया बल्कि वक्त के साथ मुद्दे को ठंडा करने का प्रयास किया।
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नई चाल या नई छवि?
वांग यी ने अपने भाषण में दावा किया कि चीन ने ‘निष्पक्ष और वस्तुनिष्ठ’ (impartial and objective) नजरिया अपनाया। उन्होंने यह भी कहा कि भारत-चीन संबंध अब ‘सुधार की दिशा’ में हैं, और शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के मंचों पर दोनों देशों में सकारात्मक संकेत बढ़े हैं।
लेकिन अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का कहना है कि यह चीन की पुरानी रणनीति का हिस्सा है—जहां वह खुद को एक वैश्विक मध्यस्थ (global mediator) के रूप में पेश कर रहा है जबकि ज़मीन पर उसके राजनीतिक हित (political interests) गहरे हैं।
नोबेल की राह या प्रचार की दिशा?
पिछले वर्षों में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप ने भी कई बार भारत-पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता की पेशकश की थी और ‘पीसमेकर’ (peacemaker) की छवि गढ़ी थी। अब चीन उसी कहानी को अपने ढंग से दोहरा रहा है।
फरक बस इतना है कि बीजिंग यह सब सार्वजनिक रूप से तब कह रहा है, जब भारत ने उसकी भूमिका को मान्यता देने से साफ इनकार कर दिया है।
कूटनीति की दुनिया में ‘क्लेम’ (claim) भी एक हथियार है। और फिलहाल चीन उसी का इस्तेमाल करते हुए खुद को अमेरिका जैसी ‘वैश्विक शक्ति’ (global power) की पंक्ति में खड़ा दिखाना चाहता है।
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