• रूस से मुंह मोड़ अब अमेरिकी तेल खरीदेगा भारत
  • प्रधानमंत्री मोदी का अमेरिका में 500 अरब डॉलर के निवेश का बड़ा वादा
  • ट्रंप प्रशासन और भारत के बीच ऐतिहासिक ट्रेड डील पर लगी मुहर
  • खेती और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में अमेरिकी सामान के लिए खुलेंगे भारत के दरवाज़े

India US Trade Deal: वॉशिंगटन के गलियारों से एक ऐसी खबर आई है जिसने पूरी दुनिया के बाज़ारों और कूटनीति के जानकारों को चौंका दिया है। कल तक जो भारत रूस से सस्ते तेल की डील के लिए चर्चा में रहता था, उसने अब अपना रुख पूरी तरह मोड़ लिया है। व्हाइट हाउस ने एलान किया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस से तेल खरीदना बंद करने और उसकी जगह अमेरिका से ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने का बड़ा वादा किया है। यह सिर्फ एक व्यापारिक समझौता नहीं है, बल्कि ग्लोबल पॉलिटिक्स की बिसात पर एक बहुत बड़ी चाल मानी जा रही है।

व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलीन लीविट ने बड़े गर्व के साथ इस समझौते का ब्यौरा दुनिया के सामने रखा। उन्होंने साफ कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के साथ एक ऐसी ‘ग्रेट ट्रेड डील’ की है, जिसका सीधा फायदा अमेरिकी आम जनता की जेब को होगा। लीविट की बातों में जीत का उत्साह साफ झलक रहा था जब उन्होंने बताया कि भारत अब न केवल रूस का हाथ छोड़ेगा, बल्कि अपनी तेल की प्यास बुझाने के लिए अमेरिका और संभवतः वेनेजुएला की ओर देखेगा।

500 अरब डॉलर का दांव और अमेरिकी बाज़ार में हलचल

इस डील की सबसे भारी-भरकम बात वह निवेश है जिसकी चर्चा हर तरफ हो रही है। भारत ने अमेरिका के अलग-अलग क्षेत्रों में 500 अरब डॉलर के निवेश का भरोसा दिया है। इसमें ऊर्जा, ट्रांसपोर्ट और खेती से जुड़े उत्पाद शामिल हैं। एक ऐसे समय में जब दुनिया की अर्थव्यवस्थाएं सुस्ती की मार झेल रही हैं, भारत का यह कदम अमेरिकी बाज़ार के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं है।

लेकिन बात सिर्फ निवेश तक सीमित नहीं है। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीर ने एक न्यूज़ चैनल से बातचीत में इस सौदे की बारीकियां समझाईं। उन्होंने स्पष्ट किया कि भले ही अमेरिका भारत पर कुछ टैरिफ (सीमा शुल्क) बरकरार रखेगा, लेकिन बदले में भारत ने अमेरिकी निर्यातकों के लिए अपने बाज़ार के दरवाजे चौड़े कर दिए हैं। अब अमेरिकी खेती के उत्पाद, मशीनें, केमिकल और मेडिकल उपकरण आसानी से भारतीय बाज़ारों में पहुंच सकेंगे।

किसानों की फिक्र और व्यापार का संतुलन

अक्सर ऐसी बड़ी डील्स में देश के भीतर छोटे व्यापारियों और किसानों के हितों को लेकर चिंता जताई जाती है। जेमिसन ग्रीर ने इस पर भी सफाई दी। उन्होंने माना कि भारत ने अपने संवेदनशील कृषि क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए कुछ बंदिशें बरकरार रखी हैं। जैसे अमेरिका अपने हितों की रक्षा करता है, वैसे ही भारत को भी अपने कुछ खास इलाकों को कंट्रोल करने का हक दिया गया है। यह दिखाता है कि यह डील केवल एकतरफा नहीं है, बल्कि दोनों देशों ने अपनी-अपनी मजबूरियों और जरूरतों के बीच एक संतुलन बैठाने की कोशिश की है।

ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति की एक और जीत

ट्रंप प्रशासन इस समझौते को अपनी बड़ी कामयाबी के तौर पर पेश कर रहा है। उनकी रणनीति साफ है—व्यापार घाटे को कम करना और अमेरिकी मज़दूरों के हितों की रक्षा करना। व्हाइट हाउस का मानना है कि मोदी के साथ हुआ यह तालमेल न केवल अमेरिका में नई नौकरियां पैदा करेगा, बल्कि ऊर्जा के बाज़ार में रूस के दबदबे को भी तगड़ी चोट पहुंचाएगा।

देसी नज़रिए से देखें तो भारत के लिए यह एक मुश्किल संतुलन साधने जैसा है। रूस के साथ पुराने रिश्तों और सस्ते तेल की मोहलत को छोड़कर अमेरिका के साथ इस नई और महंगी राह पर चलना भारत की दूरगामी सोच को दिखाता है। अब देखना यह होगा कि इस मेगा डील का असर आम भारतीय की रसोई और पेट्रोल की कीमतों पर आने वाले दिनों में कैसा पड़ता है।

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