झारखंड में हाथी का आतंक: पश्चिमी सिंहभूम में 17 लोगों की मौत, सारंडा के जंगलों में खौफ का माहौल
- झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम में एक ही हाथी ने एक हफ्ते के भीतर मचाया कोहराम, अब तक 17 लोगों की मौत।
- एशिया के सबसे घने सारंडा जंगलों के पास नोआमंडी और चाईबासा के ग्रामीण इलाकों में खौफ का साया, ग्रामीण रात भर जागकर काट रहे वक्त।
- हाथी को काबू करने के लिए ड्रोन और बाहरी एक्सपर्ट्स की ली जा रही मदद, विभाग के पास भारी वाहन न होने से रेस्क्यू में देरी।
- विशेषज्ञों के अनुसार हाथी ‘मस्त’ अवस्था में हो सकता है, जो उसे सामान्य से कहीं अधिक आक्रामक और अनियंत्रित बनाता है।
Jharkhand News: झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले के ग्रामीण इलाकों में इन दिनों सन्नाटा नहीं, बल्कि एक खौफनाक दहशत पसरी हुई है। एशिया के सबसे विशाल साल जंगलों में शुमार सारंडा की गोद में बसे गांवों के लिए पिछला एक हफ्ता किसी काली रात से कम नहीं रहा। यहाँ एक ही हाथी ने पिछले सात दिनों के भीतर अलग-अलग गांवों में हमला कर 17 लोगों को मौत के घाट उतार दिया है। आलम यह है कि सूरज ढलते ही लोग अपने घरों में दुबक तो जाते हैं लेकिन नींद किसी की आंखों में नहीं है।
खबर है कि कोल्हान और चाईबासा डिवीजन के करीब सात फॉरेस्ट रेंज में एक अकेला नर हाथी (टस्कर) कहर बरपा रहा है। यह हाथी किसी मंझे हुए शिकारी की तरह रात के अंधेरे में हमला करता है और दिन का उजाला होते ही घने जंगलों में ओझल हो जाता है। वन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, इस हाथी ने पिछले एक हफ्ते में करीब 110 किलोमीटर का सफर तय किया है जो इसके आक्रामक और बेचैन होने का सबूत है।
वह खौफनाक रात जब उजड़ गए कई परिवार
सबसे दर्दनाक मंजर 6 जनवरी की रात को नोआमंडी ब्लॉक के बावरिया गांव में देखने को मिला। यहाँ जब लोग अपनी कच्ची झोपड़ियों में गहरी नींद सो रहे थे तभी इस हाथी ने हमला बोल दिया। इस हमले में चार मासूम बच्चों समेत कुल छह लोगों की जान चली गई। इसके बाद हाटगम्हरिया, गोईलकेरा, बड़ा पसिया और लंपाइसई जैसे गांवों से भी ऐसी ही डरावनी खबरें आईं। कहीं किसी को घर के अंदर कुचल दिया गया तो कहीं बाहर सो रहे ग्रामीण इस टस्कर का शिकार बन गए।
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आज इन गांवों के हालात ऐसे हैं कि लोग अपनी जान बचाने के लिए खुद ही मोर्चे पर तैनात हैं। ग्रामीण रात भर अलाव जलाकर पहरा दे रहे हैं। आदिवासियों का कहना है कि उनके मिट्टी के घर इस विशालकाय जानवर के सामने कागज की नाव जैसे हैं जो एक झटके में धराशायी हो जाते हैं।
क्यों बेकाबू हुआ यह गजराज?
पूर्व मुख्य वन संरक्षक एल.आर. सिंह का मानना है कि यह हाथी ‘मस्त’ (Musth) की स्थिति में हो सकता है। यह नर हाथियों की वह शारीरिक अवस्था है जिसमें उनका टेस्टोस्टेरोन लेवल सामान्य से कहीं ज्यादा बढ़ जाता है जिससे वे बेहद हिंसक और चिड़चिड़े हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में हाथी को काबू करना बेहद चुनौतीपूर्ण होता है और वह किसी भी चीज को दुश्मन मानकर उस पर हमला कर देता है।
सिस्टम की लाचारी और रेस्क्यू का इंतज़ार
हाहाकार मचने के बाद अब जाकर वन विभाग ने हाथी को बेहोश (Tranquilize) कर दूसरी जगह ले जाने का फैसला किया है। लेकिन यहाँ विभाग की तैयारियों की पोल खुलती नजर आ रही है। मुख्य वन संरक्षक परितोष उपाध्याय ने स्वीकार किया कि विभाग के पास हाथी को बेहोश करने की दवा तो है लेकिन इतने भारी जानवर को उठाकर ले जाने के लिए जरूरी हेवी व्हीकल मौजूद नहीं हैं।
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फिलहाल पश्चिम बंगाल और ओडिशा से विशेष टीमें बुलाई गई हैं। ड्रोन के जरिए हाथी की लोकेशन ट्रैक की जा रही है और वंतारा जैसे संस्थानों से भी संपर्क किया गया है। लेकिन जब तक मदद जमीन पर पहुंचती तब तक कई घर उजड़ चुके हैं।
आंकड़े दे रहे हैं बड़ी चेतावनी
यह कोई पहली बार नहीं है जब झारखंड में इंसान और हाथी के बीच जंग छिड़ी हो। पिछले 18 सालों में राज्य में हाथियों के हमले से करीब 1,270 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। वहीं संघर्ष में 150 हाथियों की भी मौत हुई है। झारखंड में हाथियों के प्राकृतिक गलियारे (Corridors) छोटे होते जा रहे हैं और बस्तियां फैल रही हैं जिसका नतीजा आज पश्चिमी सिंहभूम भुगत रहा है। ग्रामीणों की अब बस एक ही मांग है कि उन्हें मुआवजे के चंद रुपयों से ज्यादा सुरक्षा की गारंटी चाहिए।
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